देख वो ख़त जो लिखा था तूने फुरकत में
कैसे जतन से रखा है उसे यक मुद्दत से
उसके हर गोशे से आती है बू मोहब्बत की
जो राहे-चश्म से दिल में समाती जाती हैं
अबरू से जख्मो पर मरहम लगाती जाती है
बोसीदा ताल्लुकात ताजा करती जाती है
मेरी शख्सियत जो लापता सी लगती थी
पता इक नया सा उसका बताती जाती है
इससे तेरी तन्हा रातों की आहटें आती हैं
मेरी खामोश सिसकियाँ जिसमें मिली जाती हैं ....अन्ना....07/01/1991