मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012

मात्री नवमी


मात्री-नवमी
मात्री-नवमी....

बहुत याद आ रहें हो
अकुलाये उर तुझे सुनने को
विज्ञान ने इतनी उन्नति कर ली
सात समुन्दर पार बात हो जाये
फिर आसमां में रहनेवालों से
बात क्यूँ ना हो पाए?

सुनती हो माँ.....
आज मात्री-नवमी है
ब्राह्मणी का श्रींगार करते
सब्र का बाँध टूटता है
तुम्हारे शौक,तुम्हारी जिद 
बेसाख्ता याद आते हैं
इक बार मिलो आ कर
मैं कुछ घड़ी के लिए
माँ बनना चाहती हूँ
तुम्हारा  दुलार करना चाहती हूँ

यूँ तो बेटियाँ  पास हैं
पर उनमें पूरी की पूरी
बस सी गयी हूँ
जिद करना वो जाने ना
हर घड़ी देखभाल
माँ सा दुलार करें
आओ ना माँ 
की मै माँ बनना चाहती हूँ
तुम्हारी जिद को जीना चाहती हूँ
तुम्हें सीने से लगा
चैन की नींद सोना चाहती हूँ.....अन्ना.....

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