प्रतिलोम था सम्मुख
प्रणयनिवेदितमय मुख
पूरक संभव कदाचित
रिक्ति विरक्ति प्रस्तुत
आत्मश्लाघावश तना
मर्म निरुपाय बना
गहन गहनि गहता
गरल पान करता
तन मन विपरीत
प्राण अनुपद अनुरत
....अन्ना..
गहनि=हठ
क्या तन जाई
क्या मन जाई
रोके कब रुक पाई
सूना पथ आँखें पथराई
खबर ना कोई आई
पराई हुई पराई
खाली दामन आई.......अन्ना....१४ जनवरी.२०१३.
खाईयां दरारें सब पाट देती
टूटी किरचों में अक्स उभारू कैसे......अन्ना...